संदेश

अन्नदाता- एक कविता

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चित्र काव्य समारोह बन सुरसा जनसंख्या मुँह खोले धरती शमशान करे जाये। लीले खेत खलिहान बनी ये दानव अमराई भी लीले जाये। झीलें ताल तलैया लीले हमने सब जीवन धन लीले जाये। नीर पी गये क्षीर पी गये सगरी धरती नमकीन कर गये। गटके उपवन जंगल सब वसुंधरा को वसनहीन कर गये। झरने नदियां पी डालीं अरु नाली में ये तब्दील कर गये। त्राहिमाम रोती है वसुधा सब जीवन सामान लील गये। गगन पिया पाताल पी गये अन्नदाता का लहू पी गये। पुष्प वाटिका वन उपवन की सुरभि सब नाश कर गये। पालनहार हमारे प्रभुवर अन्नदाता विश्वम्भर तुम हो। धरती की छाती को चीरें दिन दिन भर रवि ताप सहें। निज स्वेदकणों की माला पहने स्वर्ण बीज ये उपजायें। हिम-तापवस्त्र के दाता रवि पावस बरखा बूंदों से नहलायें। धरतीपुत्र करें श्रम निशवासर जनजन का पोषण हैं करते। निज तन औ क्षुधा दहन कर सब जन का उदर हैं भरते। ये हैं मातपिता से गुरुतर हम सब साष्टांग नमन हैं करते। रचनाकार- राजेश कुमार,  कानपुर

शुभकामना संदेश

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शुभकामना संदेश इस हरी-भरी वसुन्धरा के सभी बच्चो खुश रहो।आप सभी अगली पीढ़ी के कर्णधार हैं।पिछली पीढ़ियों ने इस धरती के साथ जो भी अन्याय किया है, उन सारी कमियों के साथ आप सभी पर महती जिम्मेदारियाँ हैं कि आप फिर से इसे खुशहाल,कीर्तिमान व समृद्धशाली बनायें।आज बाल दिवस के अवसर पर आप सभी को ढेर सारी शुभकामनायें,प्यार व आशीर्वाद।सदैव खुश रहो................-राजेश कुमार

जीवन-सार-एक तथ्य

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जीवन-सार बहुत समय पहले बाबाजी की मृत्यु हुयी थी।उस समय मेरी उम्र मात्र 12 वर्ष की थी।बाबाजी को सभी लोग बापू कह कर पुकारते थे।तब बापू के नाम के शब्द का अर्थ भी नहीं मालूम था।तब जीना मरना क्या होता है यह सब समझ से परे था।बाबाजी की मृत्यु के 40 वर्षों बाद पिताजी की मृत्यु हुयी,तब मेरी उम्र 52 साल की थी।बाबाजी व पिताजी की मृत्यु के दौरान के 40 वर्षों में इस संसार के बारे में काफी कुछ जानने समझने का समय मिला।पिताजी की मृत्यु के समय लगता था कि अभी तो अपने पास कम से कम 30 वर्ष का जीवन और है।इन तीस वर्षों में जम कर जियो।जीना मरना तो प्रकृति के दो पहलू हैं जिनकी सत्यता से कोई भी बच नहीं सकता।जीवन मरण तो कपड़े बदलने जैसा है।आत्मा ने पुराने कपड़े उतार फेंके एक शरीर की मृत्यु हो गयी, आत्मा ने नये कपड़े धारण कर लिये तो एक नया जीवन का प्रारम्भ हो गया।लेकिन यह सब तो किताबी ज्ञान की तरह है जो पढ़ने, सुनने व सुनाने में ही अच्छा लगता है।जब स्वयं के ऊपर बीतता है तब उस सत्य की कड़वाहट से परिचय होता है।जिस प्रकार जलते हुए दीपक का तेल क्षण प्रति क...

धुंध- एक कविता

  धुंध रवि नैनों से ओझल भए कायनात में धुंध छा गयी। राही राहों से भटके वो राहें जाने कहाँ गुम हो गयीं। प्रगति-प्रदूषण साँप-सीढ़ी बने जो सब जीरो कर जाये। प्रगति बनाये धूल-धुवाँ फिर प्रगति धुवाँ-धुवाँ हो जाये। रचनाकार- राजेश कुमार, कानपुर

ताजमहल एक प्रेम प्रतीक- एक कविता

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ताजमहल एक प्रेम प्रतीक प्राण प्रिया मन में बसें चाहत का ताज सजे दिल में । प्रीति की भाषा सब कोई जाने नैनों से इसको पहचानें। प्रिया सभी मुमताज सरीखी पर हर कोई शाहजहाँ नहीं। चाहें प्रिय का ताज बनाना पर सब यहाँ शहंशाह नहीं। दिल में मुमताज सजाये पर चूल्हे-चक्की में हैं पिसते। इसका जग में बाजे डंका दरश ताज को हर कोई तरसे। ठहरे कुछ वो खुशनसीब जग के हैं जो तेरा दीदार करें। जग का प्रेमप्रतीक ताज है खायें कसमें इसकी छाँव तले। जाति धर्म मजहब के बन्धनों से तो इसको ही दूर रखें। निज सत्कर्मों से बने ताज अपना नाम अमर कर जायें। सत्कर्मों के ताजों की बरखा फिर ये गिनती खत्म ना हो। बीज प्रीति के जीवन में बोयें जग में भ्रातृभाव छा जाये। रचनाकार- राजेश कुमार,  कानपुर

मेरे भइया- एक कविता

मेरे भइया अग्रज बना के परमेश्वर ने, मुझ पर ये उपकार किया। मेरे भइया पिता तुल्य हैं, रक्षक संरक्षक दिग्दर्शक सब हैं। जब भी हम कोई गल्ती करते, प्यार भरी वह डांट पिलायें। गर जो मुश्किल आन पड़े, वो हल कर हलका कर देते। आंधी तूफां अरु कड़ी धूप में, वो शीतल मंद बयार बनें। राहें जब सगरी मिट जायें, वो खुद ही मेरी राहें बन जायें। घनी अंधेरी तूफानी रातों में, प्रकाशपुंज बन हमराह रहें। ढल आई है सांझ जीवन की, वो अब तक मेरी ढाल बने। कठिन पलों मुश्किल घड़ियों में, भइया ही तारनहार बने। राम लखन से दोनों मेरे भाई, मैं भरत नहीं हूँ बन पाया। मैं करता रहता दिन रात दुआयें सबको ही ऐसे भाई मिलें। रचनाकार- राजेश कुमार, कानपुर

आईना सामाजिक असमानता का-एक लेख

प्रस्तुत लेख करीब 10 वर्ष पूर्व लिखा गया था कमोवेश स्थितियां अभी भी ऐसी ही हैं कोई बदलाव नहीं आया हैं।क्योंकि इस प्रकार के समाचार अभी भी पढ़ने-सुनने को मिलते रहते हैं।लेख कुछ इस प्रकार है.................... आईना सामाजिक असमानता का           हाल के समाचार पत्रों में आई कुछ घटनाओं ने मुझे यह लेख लिखने को प्रेरित किया जो निम्नवत् हैं। 1- - हमीरपुर जिले के पचखुरा गाँव में खंगार(दलित) जाति की महिला का सिर तथा कथित ऊँची जाति के दबंग लोगों ने अपने घर के बाहर चारपाई पर बैठने और चारपाई से उठकर पैंलगी(पैर छूकर प्रणाम करना) न करने के अपराध में फरसे से भुट्टे की तरह काट डाला। दैनिक जागरण  12 जुलाई 2007 2- - कानपुर देहात, थाना मंगलपुर अन्तर्गत गडि़या गाँव निवासी ऊँची जाति के दबंग माटीराम ने अनिल कुमार सविता से अपने घर पर चलकर बाल काटने के लिये कहा।उसकी सैलून की दुकान पर पहले से कुछ व्यक्ति बाल कटवाने के लिये इंतजार कर रहे थे।घर चलकर बाल काटने से मना करने पर माटीराम ने तलवार से अनिल का हाथ काट डाला। दैनिक जागरण  19 जुलाई 2007 3- ...