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आशीर्वाद व भेंट

आशीर्वाद व भेंट भारतीय संस्कृति में अनगिनत परम्परायें हैं।जिनका जगह,क्षेत्र व समय के साथ अपना महत्व है।यह परम्परायें युगों व सदियों के अन्तराल में शनैः-शनैः विकसित हुई हैं।अक्सर इनमें गूढ़ अर्थ व उद्देश्य निहित होते हैं, जिन्हें समझ पाना सामान्यजन के बूते के बाहर होता है।आज की भाग दौड़ भरी व्यस्ततम जिन्दगी में इन परम्पराओं की छवि कुछ धूमिल होती जा रही है।फिर भी इनकी चमक मध्यम होने के बावजूद भी किसी न किसी रूप में अभी भी जारी हैं।इन परम्पराओं में एक  भेंट लेना व भेंट देना है।भेंट शब्द के कई अर्थ होते हैं।जब किसी से आमने सामने मुलाकात होती है, तो कहते हैं उनसे भेंट हुई थी।मायके से जब कभी बहन व बिटिया की विदाई होती है तो वह सबसे अश्रुपूर्ण नयनों से गले मिलकर भेंट करती है।कहा जाता है कि अब ना जाने कितने दिनों बाद दुबारा भेंट हो सकेगी।इसके अतिरिक्त जब किसी के घर जाते हैं तो उसके यहाँ खाली हाथ न जाकर कुछ उपहार स्वरूप भेंट देना रहता है।गरीब सुदामा अपने सखा कृष्ण के लिये भेंट स्वरूप तान्दुल(चावल) ले गये थे। इस उदाहरण से इस परम्परा का पुरातन व सनातन स्वरूप प्रदर्शित होता है।इसी श्रंखला ...

भारतीय रेल और हमारी संस्कृति एक प्रसंग

भारतीय रेल और हमारी संस्कृति अभी हाल में ही हमारे भारत देश में नदियों को जीवित मानव मानते हुए उन्हें संवैधानिक अधिकार प्रदान किये गये हैं।नदियाँ युगों-युगों से मानव संस्कृति की ध्वज वाहक बन कर इस सृष्टि को सराबोर करती रहीं हैं।इस श्रंखला को यदि हम आगे बढ़ायें तो भारतीय रेल का भी महत्वपूर्ण स्थान है।नदियों की भांति भारतीय रेल भी दशकों से भारतीय संस्कृति की ध्वजा थामने का कार्य कर रही है।इस संदर्भ में एक कहानी प्रस्तुत की जा रही है। शिवाजी अपने घर के बाहर एक पेड़ के नीचे चारपाई बिछा कर लेटे हुए थे।उनका घर रेलवे लाइन से कुछ दूरी पर था।सामने से एक तेज रफ्तार रेलगाड़ी गुजर रही थी।उनके बगल में ही सात-आठ वर्ष की उम्र के कुछ बच्चे रेलगाड़ी को देखकर टा-टा,बाय-बाय करते हुए बड़ी प्रसन्नता से हाथ हिला रहे थे।सभी बच्चे हम उम्र थे।उन सबकी आँखों में सामने से दौड़ती हुई रेलगाड़ी को देखने,और उसकी ओर हाथ हिलाने का अपना एक अलग ही अंदाज व उत्साह झलक रहा था।यह सब देखकर शिवाजी अपनी पुरानी यादों में खो गये।दशकों से पीढ़ी दर पीढ़ी उनका परिवार इसी गाँव में रह रहा था।उनके गाँव का नाम किशनगाँव ...

सुप्रभात

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((((( भगवान की प्लानिंग ))))) ✌✌✌

 ((((( भगवान की प्लानिंग ))))) ✌✌✌ एक बार भगवान से उनका सेवक कहता है,भगवान-आप एक जगह खड़े-खड़े थक गये होंगे।. एक दिन के लिए मैं आपकी जगह मूर्ति बन कर खड़ा हो जाता हूं, आप मेरा रूप धारण कर घूम आओ। भगवान मान जाते हैं, लेकिन शर्त रखते हैं कि जो भी लोग प्रार्थना करने आयें, तुम बस उनकी प्रार्थना सुन लेना कुछ बोलना नहीं।मैंने उन सभी के लिए प्लानिंग कर रखी है। सेवक मान जाता है ।. सबसे पहले मंदिर में बिजनेस मैन आता है और कहता है, भगवान मैंने एक नयी फैक्ट्री डाली है ,उसे खूब सफल करना ।वह माथा टेकता है, तो उसका पर्स नीचे गिर जाता है। वह बिना पर्स लिये ही चला जाता है। सेवक बेचैन हो जाता है. वह सोचता है कि रोक कर उसे बताये कि पर्स गिर गया, लेकिन शर्त की वजह से वह नहीं कह पाता।. इसके बाद एक गरीब आदमी आता है और भगवान को कहता है कि घर में खाने को कुछ नहीं. भगवान मदद करो।. तभी उसकी नजर पर्स पर पड़ती है. वह भगवान का शुक्रिया अदा करता है और पर्स लेकर चला जाता है ।अब तीसरा व्यक्ति आता है , वह नाविक होता है ।वह भगवान से कहता है कि मैं 15 दिनों के लिए जहाज लेकर सम...

प्यारी साइकिल एक कविता

प्यारी साइकिल नई नई साइकिल जब कीनी, मनमोहिनी सी वह प्राणपियारी। लगी झालरें रंगविरंगी, फूल लगे प्यारे प्यारे। गाँठ सवारी जब हम चलते, उड़ जाती वह फुर्र पवन सी। रखते ध्यान सदा हम उसका, करते उसकी साफ सफाई। चमका चमका कर रखते उसको, ज्यों मालिश होती घोड़े की। हो विचार मन में जाने का, क्षण में पहुँचाती वो अलबेली। इठलाती बलखाती चलती, लहराती थी नागिन सी। मनभावनी वो प्राणप्रिया सी, लगती थी वो राजदुलारी। कभी बिठा कर भार्या को, सैर कराते बाजारों की। कभी मचलते बच्चे को, रौनक दिखलाते सड़कों की। परिवार भरण पोषण की खातिर, ले जाते चक्की हाट तलक। सालों साल सवारी की है, दफ्तर जाने का अवलम्ब वही। रोजी रोटी की भागदौड़ में, रोशन करती थी राहों को। टनटन कर जब चले सड़क पर, वो भीड़ फाड़ती काई सी। पड़ जाती बीमार कभी तो, नम कर देती थी नयनों को। समय चक्र नहीं रुकता है, उड़ जाता खुशबू की माफिक। जीवन की आपाधापी में, रफ्तार नहीं कम होने वाली। कायल हो रफ्तार के हम, ले आये इक मोटरसाइकिल। मोटरसाइकिल की चकाचौंध ने, कर दिया किनारे साइकिल को। डर...

बिजली के खंभे पर पीपल का पेड़ - एक कविता

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बिजली के खंभे पर पीपल का पेड़ +  एफ जी के स्पोर्ट्स ग्राउन्ड के सामने एक बिजली का खंभा है।जिसकी चोटी पर एक पीपल का पेड़ उग आया है।अभी पिछले कुछ दिनों से देखा गया है कि बीच-बीच में जब उसकी डालियां बड़ी हो जाती हैं।तो आरमापुर इस्टेट के कर्मचारियों द्वारा उन्हें काट दिया जाता है।लेकिन पेड़ की जड़ें जमीन के अन्दर तक प्रवेश कर गयी हैं।तो वह पेड़ बार-बार नये जोश से पुनः उठ कर खड़ा हो जाता है।अतः ऐसा मालूम होता है कि मानो प्रकृति मानव शक्ति को चुनौती दे रही हो।बिजली के खंभे की जुबानी कविता कुछ इस प्रकार है। मैं हूँ एक निष्क्रिय बिजली का खंभा, लौह रेत सीमेंट से संवरा मेरा गात। खड़ा अविचल मैं तमाम दशकों से, निहारता बाट जोहता पथिकों की। बना हुआ मैं उनका कुतुबनुमा, देखे हैं मैंने अनगिनत बसन्त। कड़क ठंड और जलते सूरज ने, ली है मेरी कठिन परीक्षा। कभी मुझमें भी बहती थी विद्युत धारा, जिससे रोशन होती ...

बेनी हनहा

बेनी हनहा वेणु प्रसाद तिवारी खेतिहर परिवार से सम्बन्ध रखते थे।परिवार में 50 बीघा जमीन की काश्तकारी थी।उनके परिवार को इलाके के काफी सम्पन्न लोगों में माना जाता था।वेणुजी तीन भाइयों व दो बहनों में सबसे बड़े थे।बड़े होने का सम्मान उन्हें पूर्णरूप से मिलता था।वह भी अपने सभी भाई-बहनों का बड़ा ही ध्यान रखते थे।वह बड़प्पन की जिम्मेदारियों से वाकिफ थे।जिम्मेदारियों को निभाने के साथ उनके केवल दो ही शौक थे।वह शुद्ध पौष्टिक भोजन का भरपूर सेवन व शरीर की नियमित वर्जिस कसरत करते थे।जिससे उनका शरीर निखर कर रह गया था।सात फुटा कद मोटी जांघें मजबूत कद-काठी वाला शरीर उनकी शान ही निराली थी।उनकी गिनती इलाके के जाने-माने पहलवानों में होती थी।कुश्ती के अखाड़े में उनका कोई शानी नहीं था।ना जाने कितनी बार वह कुश्ती का दंगल जीतकर वापस घर लौटे थे।घर-परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वाह करते-करते उन्होंने कभी अपने बारे में सोचा ही नहीं था।खेती किसानी के तमाम झंझटों, जिनका कोई पारावार ही नहीं था।उन सबका वह बराबर निर्वहन करते रहे।छोटे भाइयों ने बड़े भाई के योगदान को देखते हुए इन सब झंझटों से मुक्ति पा ली...