स्वच्छता अभियान- एक कविता

स्वच्छता अभियान
चश्मा दरश कराता जग की गर नजर हमारी कम हो जाये।
रकम रकम के काले नीले ये सब बाजारों में मिल जायें।
दुनिया चाहे जैसी भी हो पर सब ये अपने रंग में रंग डालें।
जग में तन में भरी कालिमा प्रण सब निरमल का कर डालें।
बाल वृद्ध सब मिल करें सफाई जग आँगन की धूल बुहारें।
सात पाँच की लाठी भी मिल कर इक जन का बोझा बन जाये।
पर गर वहन करें सब मिल कर आसान सभी राहें हो जायें। 
ऊँच नीच औ जात पात की मुंडेरों से हम छुटकारा पा जायें।
सभी पीढ़ियां मिल समाज की मल मल कर निरमल हो जायें।
मल मल कर मल को सब धोयें जग तन तम निरमल हो जाये।
श्वेत पदम सा हो जग आँगन धूल धुवाँ सब दूर भगायें।
जन-जन जग के इक मंच तले हों जन मानस परिवार बनायें।
हो तन मन में गर भरी गंदगी सब तज जीवन सफल बनायें।
रचनाकार- राजेश कुमार, कानपुर
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